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मेरे बारे में...

मैं पेशे से बैंकर हूँ । मानता हूँ कि यह मेरा दुर्भाग्य है और बैंक का भी ।मेरा मिजाज बैंक के नौकरी के अनुरूप नहीं है । फिर भी कोशिश रहती है कि पेशे के प्रति ईमानदार रहूँ और अपनी जिम्मेदारियाँ ठीक तरीके से निभा सकूँ । हालांकि इस बात को भली भांति जानता हूँ कि बैंक की नौकरी आजीविका के अलावा मुझे समाज में सकारात्मक योगदान देने का अवसर भी देती है । कोशिश रहती है कि नियमों के दायरे में रहते हुये लोगों की मदद कर सकूँ । साथ ही बैंक और उसके कामकाज संबंधी जानकारी और अनुभव का प्रयोग वित्तीय साक्षारता के लिए , अपने सहकर्मियों की समस्याएँ सुलझाने और उसके प्रति जागरूक बनाने , बैंकरों और जनता के बीच सेतु बनाने के लिए करने का प्रयास रहता है । लेखक नहीं हूँ और न ही अब होने की ख्वाहिश बची है । बस लिखने का शौक है । लेकिन वह कभी नहीं लिख पता जो लिखना चाहता हूँ । इसलिए वही लिखता हूँ जो लिख सकता हूँ । लिखने से दुनिया को क्या फर्क पड़ता है और मुझे क्या फर्क पड़ता है , इस बारे में ठीक ठीक कुछ नहीं कह सकता ।लेकिन जिंदगी के मायने समझे बगैर जिये जा रहा हूँ तो लिखने के मायने समझे बगैर लिखते जाने में कोई हर्ज नहीं समझता । मतलब शायद लिखते लिखते हुये ही मिले । न भी मिले तो ठीक है ।

पिछड़ी कही जानी वाली एक जाति में पैदा हुआ हूँ । जाति को लेकर न शर्म है , न अभिमान । जिस जाति में पैदा हुआ हूँ उस जाति के प्रति कोई विशेष लगाव नहीं है । सभी बहुजनों के प्रति एक समान लगाव है । सवर्णों के प्रति कोई दुराग्रह नहीं है और न ही उन्हें जातिगत पहचान में सीमित करना चाहता हूँ । लेकिन सवर्णों के साथ बर्ताव में सावधानी बरतता हूँ । उनकी स्वीकृति और संबंध के लिए मेरे मन में विशेष आग्रह नहीं है । जातिवाद का घनघोर विरोधी हूँ । लेकिन जातिवादी कहलाने के डर से जाति पर लिखना नहीं छोडने वाला हूँ । जाति पर लिखने का मेरा उद्देश्य बहुजनों को जागरूक करना है और साथ ही जामीन पर भी उनके लिए यथासंभव और यथासामर्थ्य कुछ सकारात्मक करने का प्रयास रहता है । मैं खुद को बुद्धिजीवी नहीं श्रमजीवी मानता हूँ । नास्तिक हूँ । अधार्मिक हूँ । नास्तिकता का प्रचार करना अपना दायित्व समझता हूँ । किसी धर्म का सम्मान नहीं करता हूँ , लेकिन लोगों के अपने धर्म के पालन पर प्रचार के अधिकार का समर्थन करता हूँ । लेकिन इतना नहीं कि नास्तिकता और धर्म विरोध छोड़ दूँ |