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संघ के आरक्षण विरोधी बयान पर प्रतिक्रिया

पिछले दिनों संघ के एक पदाधिकारी ने आरक्षण के खिलाफ बयान दिया । विरोध के बाद संघ ने खंडन कर दिया । लेकिन संघ को हल्के में नहीं लिया जा सकता है , बावजूद खंडन के । संघ का अपना एजेंडा है और वे उस पर लगातार काम करते है । उनके उद्देश्यों और विचारों से आपत्ति हो सकती है लेकिन उनके संगठन और क्षमता को कम करके आंकना भूल होगी । यह ध्यान रखना चाहिए कि देश का प्रधानमंत्री उनका स्वयंसेवक है और संसंद से ज्यादा अपनी जवाबदेही संघ के प्रति मानता है ।

संघ जिस हिंदू राष्ट्र की बात कहता है , उसकी नींव में वर्णाश्रम व्यवस्था है जो परंपरागत जाति व्यवस्था को बनाए रखना चाहती है । आरक्षण पर हमला अकारण नहीं है यह वह टूल है जिसके द्वारा शासन और समाज में बहुजनों की भागिदारी बढ़ी है ।संघ और सवर्ण तबकों द्वारा इसकी आलोचना अधिकाँश मामलों में जातिगत अहंकार और घृणा से संचालित हैं , न कि किसी वस्तुनिष्ठ विवेचना के कारण ।

इससे पहले भी संघ ने आरक्षण के खिलाफ बयान दिया है । वे कोई नई बात नहीं कह रहे हैं ।वे बस सवर्ण तबके की आकांक्षा व्यक्त कर रहे हैं और उनके हित के लिए प्रयासरत हैं । उनके बयान वापस लाने को उनकी हार और हमारी जीत मानना भूल होगी ।

हकीकत है कि आरक्षण को कई जगहों पर लागू नहीं किया गया है और तमाम तरह की धाँधलियाँ करके इसे निष्प्रभावी बनाने का प्रयास सत्ता संस्थानों में जड़ जमाए सवर्ण करते रहे हैं ।

बहुजनों के लिए आरक्षण नॉट नेगोशिएबल है ।

 

संघ के आरक्षण विरोधी बयान पर प्रतिक्रिया